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        कैसा यह नवताप 

 
क्षत-विक्षत करने को आतुर
यह कैसा नवताप

कहाँ बिछाऊँ दरी- बिछौना कहाँ मिलेगी छाँव।
रेन्ड बना है मुखिया जब से, अब बबूल के गाँव
सूख गए हैं कूप-बावड़ी
पोखर करें विलाप

फैल गए हैं कंकरीट के झाड़ और झंखाड़
द्विगुणित करते और ताप ज्यों भड़भूजे का भाड़
सरकारी आदेश बने हैं-
शीतल मधुर प्रलाप

नंगे पाँव तवे पर चलते, रहे रोटियाँ सेंक
दोपहरी में जले दिहाड़ी, क्या यह किस्मत नेक
लू की लपटें लप-लप करतीं
श्रम को दें संताप

अर्ध-शतक तक सूचकांक का- पारा अपरंपार
विक्षोभित् यह प्रकृति हमारी खाए बैठी खार
पंचतत्त्व प्रतिकार कर रहे-
देकर हमको शाप

- दिनेश श्रीवास्तव
१ जून २०२६

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