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        आ गया फिर ग्रीष्म 

 
आ गया फिर ग्रीष्म लेकर दाह

हो गई फिर धूप पावक
बनी लपरें मूदु हवाएँ
हो गए फिर उष्ण-दाहक
अवनि-अंबर, सब दिशाएँ
हो चले सब पंथ सूने,
शीत छाया की सभी को चाह

क्षीणकाया हुईं सरिता
ताल-पोखर तनु-उदासे
गात धरती का दरकता
ढूँढ़ते जल, जीव प्यासे
क्लांत तन-मन, अधर सूखे,
वसन गीले, सतत स्वेद प्रवाह

हुए त्रासद दिवस उष्मित
दुःखद लंबी रैन बेकल
ग्रीष्म के संत्रास-पीड़ित
लगें युग से दाहते पल
सघन शीतल विटप कटते
व्यर्थ देखें मूदु अनिल की राह।

- ब्रजेश कुमार मिश्र 
१ जून २०२६

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