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        नशा धूप का  

 
नशा धूप का सूर्य चढ़ा कर, लेने लगा परीक्षा
पथिक पेड़ घर आ कहते प्रभु
दो छाया की दीक्षा

काँधे पर जा सजे अँगोछे, पल-पल पंखा झलते
चश्मे के पीछे से देखें, नैन धरा को जलते
तपे तवे-सी सड़क माँगती
ठंडे जल की भिक्षा

झूल रहा आ अमराई में, थक कर पवन हिंडोला
गली-गली में लू-लपटें भी, चूस रही हिम गोला
कूलर एसी तापमान की
बैठ करे अन्वीक्षा

पाँव रेत में जले नदी के, सिकुड़ गई परछाई
खड़ी मेढ़ पर दूर्वा-दुल्हन, धूप नहाकर आई
बैठ दुपहरी काम-काज की
करती गहन समीक्षा

प्रश्न सभ्यता ने पूछें हैं, अपने बीते कल से
कैसे भरें रहेंगे कलसें, जग के मीठे जल से
प्यासे जीवन को उत्तर की
अब है विकल प्रतीक्षा

- भीमराव 'जीवन'
१ जून २०२६

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