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        बदलता गहना

 

सर्दी आऐ तो कहते है
बसंत कब बगराऐगा
गर्मी के आने पर कहते है
बरसात कब आऐगी
रे मनुज कुछ तो धेर्य रख
रूत अपना बाना पहनती है
तू भी सीख ले इसका कहना
पहनले बदलता ये गहना।

कब खेतिहर खेत जाएँगे
धरती का आँगन सहलाएँगे
पसीना सींचेंगे बीज बोएँगे
तेरे घर दाना दुनका पहुँचाएँगे
बसंत बगराता है जब जब
महकता गीत लाता है तब
वीणा स्वर वीणा वादिनी
मधुर विहंग कलरव लाती है।

तू हर मौसम का स्वागत कर
जी कर इसका अभिवादन कर
पाऐगा नयी उर्जा पल पल
आरोग्य का अब आस्वादन कर
रे मनुज कुछ तो धैर्य रख
रुत अपना बाना पहनती है।

तू मान इसका कहना
पहनले बदलता ये गहना।

- सुंदर पारख
१ जुलाई २०२६

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