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        ऋतुएँ हार जाती हैं

 

पथरीली राहों पर चलती
हर साँस भी जैसे जलती है

पेड़ों की सूनी छाया में
थककर बैठी दोपहर मिली
नदियों का जल भी चुपचाप
गर्मी की पीड़ा सहती मिली
पुरवा बदन झुलसाती है
पछवा भी राहत नहीं देती
इस तपती धरती को
कुछ बूँदें राहत नहीं देतीं

फिर भी उम्मीद के आँगन में
एक ठंडी बयार सी चलती है
परंतु मानव के धैर्य के समक्ष
ऋतुएँ आखिर हार जाती हैं

- निरुपमा सिंह ढाका
१ जुलाई २०२६

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