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        कड़ी धूप की जिद

 

कड़ी धूप की देख ज़िद कोने दुबकी छाँव
अपनी -अपनी आग में जलता सारा गाँव

सूरज की भौहें चढ़ीं खाने लगा उबाल
समाधान क्या दें भला उलझे हुए सवाल

रेतीली संवेदना पथरीला संवाद
कड़ी धूप में हो रहा मरुथल का अनुवाद

गलत आज फिर हो गया मौसम का अनुमान
क्रूर धूप से जूझते खेत और खलिहान

अंगारों से जल उठे गुलमोहर संकेत
खौल -खौल कर हो गई नदी आँख की रेत

नदी बिकी बाज़ार में पानी काले कोस
प्यासी जनता क्या करे चाट रही है ओस

आपस में करने लगीं किरनें क्रूर सलाह
बड़े सबेरे हो गया सूरज तानाशाह

प्यासी है सारी प्रजा प्यासा है सम्राट
अग्निकुंड से हो गए पानी वाले घाट

गर्म थपेड़े पी रहा पत्ता -पत्ता ज़र्द
दुपहर अपनी आँख से पोंछ रही है गर्द

धधक रही सी प्यास में उबल रही है पीर
लपटों की नावें चलें जले नदी का नीर

हवनकुण्ड से देश में मुँह फैलाती आग
किसे पड़ी है जो यहाँ छेड़े बादल राग

पानी दिखता ही नहीं पाया कारावास
होठों पर जलने लगी अंगारों सी प्यास

गर्म टीन सा तप रहा हर कोमल एहसास
पिघला सा डामर पिएं सड़कें दिखें उदास

नदी किनारे ऊँघती टीले बैठी शाम
पानी में मुँह धो रहा दिन भर का कुहराम

पूर्व नियोजित सा लगे नदी नाव संयोग
अपने ही षडयंत्र हैं अपने ही आयोग

कठिन लकीरों से भरा उसका सरल स्वभाव
पत्थर जैसा हो गया पानी का बर्ताव

गर्म धूल आँखों भरी कैसे भरता घाव
सीधे मुँह क्या कुछ कहे औंधे मुँह की नाव

- यश मालवीय
१ जुलाई २०२६

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