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        अनचाहा संताप

 

लू में हर जन भोगता अनचाहा संताप
दुश्मन मेघों का बना भानु किरण का ताप

मेघों से धरती कहे कब बरसोगे तात
प्यासी वसुधा माँगती थोड़ी सी बरसात

जंगल सारे कट गए कैसे हो बरसात
तपती धरती पर लिखी पर्यावरणी बात

धरती पर हर ताप का भानु ताप सरताज
गौर वर्ण पर हो गया स्वेद कणों का राज

भानु अनल से तप रहे धरती अंबर आज
प्यासा जीवन हो गया बारिश का मुहताज

सुशील सरना
१ जुलाई २०२६

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