अंजुमनउपहारकाव्य संगमगीतगौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहे पुराने अंक संकलनअभिव्यक्ति कुण्डलियाहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतर

        दोहा मुक्तक गर्मी

 

आग बरसती व्योम से लू में तपे बयार
तन झुलसे सीकर झरे शक्ति हुई है खार
पस्त हुआ है हौसला थका हुआ तन प्राण-
कैसे पूरे कर्म हों गर्मी करे प्रहार


सूखे पल्लव झड़ लिए कोमल पर्ण सुगात
छाया ढूंढें हैं पथिक ग्रीष्म काल की घात
शीत छुपी है छांव में लू का विकट प्रकोप -
जीना दूभर हो गया आग उगलती रात


तपती धरती मांगती बादल से अनुराग
श्याम जलद बरसें सघन जीवन खेले फाग
शुष्क हुए कण अग्नि से विकल हो रही वात-
लगें थपेड़े धूप में दुबके प्राणी जाग

- सुधा अहलुवालिया
१ जुलाई २०२६

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलन हाइकु हास्य व्यंग्य क्षणिकाएँ दिशांतर समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter