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        आये हैं दिन धूप के

 

दिन दूने फिर चौगुने बढ़ती नित रफ्तार
आये हैं दिन धूप के लू की है ललकार

दिन जलता अंगार-सा दहक रहा हर ठाँव
पाँव..पाँव से पूछता कहां रखें अब पाँव

पारा अड़तालिस हुआ सूखे सारे ताल
सूरज के इस चाल से हाल हुआ बेहाल

पात-पात हलचल नहीं गलियाँ भी सुनसान
चली गयी शायद हवा करने गंगा-स्नान

मन तपता बैशाख-सा जेठ अभी है शेष
सूरज छाँव तलाशता अमरैया के देश

कड़क धूप है जेठ की तिस पर लू की मार
घर के भीतर कैद है छोटा सा संसार

जल जल कर ये धूप भी बरस रही है खूब
जल जल जल कहती हुई जल को तरसे दूब

सूरज अपने आप पर अब इतराना छोड़
अहंकार का ये घड़ा बादल देंगे फोड़

कल तरसाती धूप थी अब तड़पाती धूप
जीवन में मिलता नहीं समय सदा अनुरूप

जीवन देते हो हमें हो रथ पर आरूढ़
हे देवाधिदेव भानु है रहस्य यह गूढ़

- श्रीधर आचार्य 'शील'
१ जुलाई २०२६

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