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        सूरज रहा दहाड़

 

सूख गई है "माँजरी" कटे अनगिनत पेड़
प्यास किनारे पर पड़ी उठती हृदय घुमेड़

साँसें उखड़ी कूप की नदी- ताल मरु- रेत
भूखे हैं कोठार सब मूर्छित प्यासे खेत

सूखी नदियाँ कूप सब जंगल कटे पहाड़
लपटें नंगा नाचती सूरज रहा दहाड़

वन काटे कंक्रीट के लक-दक बने मकान
प्रखर ग्रीष्म अब खींचता बाशिंदों के प्राण

भले ग्रीष्म गुस्सैल है उसके हिय भी प्रीत
अमराई फल से लदी कोयल गाती गीत

- शशिकांत गीते
१ जुलाई २०२६

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