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        गहन ग्रीष्म का रौद्र मन

 

तीव्र त्वरा तृष्णा तपिश तीक्ष्ण तरास अभंग
गहन ग्रीष्म का रौद्र मन पस्त धरा के अंग

उग्र ताप रह-रह करे लथपथ देह उघार
स्वेद-धार में लस्त हैं आँगन के उद्गार ..

क्रुद्ध ग्रीष्म निष्ठुर हुआ करे अतुक व्यवहार
शष्य-धरा जब निर्जला त्रस्त रहे संसार

धनबल के अभिजात्य से उत्कट चाह अधीर
शहरों के ऋतु-चक्र क्या जन के हिस्से पीर

गमलों भर वन-बाग जब पशु फिरते सिर पीट
पक्षी बिन घर-घोंसला हावी अब कंक्रीट ..

गिनती में उन्चास हैं कहते पवन-बयार ..
बहे परंतु पचासवीं यही ग्रीष्म व्यवहार !

- सौरभ पाण्डेय
१ जुलाई २०२६

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