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        गर्मी वाले छंद

 

लू-गरमी की मार से तपे खेत-खलिहान
छाँह खोजते फिर रहे पंछी ‘औ’इंसान

चाय दूध सब भूलकर माँगे जल संसार
मटके वाला शीतजल देता खुशी अपार

मिलकर सब करने लगे बादल से फरियाद
जेठ तपा तो आ गई पावस की अब याद

हर मन को अब भा रहे आडू लीची आम
आम - खास के खेल में बढ़े आम के दाम

किस्सों वाली छाँव में बच्चे बैठे पास
साँझ ढले छत पर मिले हँसी-ठिठोली खास

बिजली आँख मिचौलियाँ दे जाती आघात
दादी - माँ पंखा झलें सारी - सारी रात

गरमी के वे रात - दिन बीता सुन्दर काल
मोबाइल से दूर थे जब बचपन के साल

धरती माँ की गोद में रोपे यदि इक पेड़
नहीं सताए फिर कभी गरमी से मुठभेड़

अपनों के दुःख में बने गुलमोहर की छाँव
जलते मौसम में मिले प्रेम भरा इक गाँव

बीती गरमी दुपहरी लिख-लिख दोहा छन्द
सरगम के सुर से खिले खुशियों का मकरन्द

…पारुल तोमर
१ जुलाई २०२६

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