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सूरज उगले
आग |
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अमराई की छाँव भी, देती नहीं
सकून
सूरज उगले आग सी, कैसा आया जून
हवा चुभ रही तीर सी, जलता कोमल गात
आओ कारे बादरा, रोको यह उत्पात
जेठ, ज्येष्ठ समय डांटता, ताने मारे धूप
अमराई नव बधू सी, फिरे छुपाती रूप
उमस भरी इस शाम को, कैसे काटा जाय
ठहर गए इस पवन को, सब में बांटा जाय
तपती धरती मांगती, मानव से ही त्राण
वृक्ष लगाओ धरा पर, राखो सबके प्राण
- निशेष जार
१ जुलाई २०२६ |
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