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        बौराया दिनमान

 

चढ़े जेठ आकाश में बौराया दिनमान
धरती पर बरसा रहा मृदुल अनल के बान

अकुलाया सा घूमता है नभ में रजनीश
प्यास कुंए की पहर पर पटक रही है शीश

हुए निर्वसन पोखरे गहराये हैं कूप
छाया फिरती खोजती पगलाई सी धूप

सहमी खड़ी अगोरती प्रकृति परी बेहाल
तांडव करता घूमता है अगिया बैताल

सिकुड़ी सहमी सी पड़ी नदी ओढ़कर रेत
लपट लपेटे देह में नृत्य कर रहे प्रेत

तपन तपायें तन-बदन पवन फिरे बेहाल
पुष्प गंध मकरंद का मिले न पुरसाहाल

ए.सी. बेबस हांफते पंखे कूलर फेल
इस गर्मी की नाक में डाले कौन नकेल

छाया की काया हुई दुर्बल और मलीन
जल के सारे जल गये शीतलता के जीन

बस्ती है निश्चल पड़ी सूंघ गया ज्यों सांप
याकि कुपित ऋषि का किसी मृदुल फला अभिशाप

मौसम के मन भा गया कालीदह का नाग
फुंफकारने भृकुटी चढ़ा उगले अविरल आग

- डॉ मृदुल शर्मा
१ जुलाई २०२६

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