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        गर्मी के मुक्तक

 
ताक रहे हैं आसमां को होकर बेक़रार!
पशु पक्षी अब सभी हो गये हैं लाचार!!
होता नहीं सहन ये ताप अब गर्मी का
पड़ती है कब तक देखें सावनी बौछार!!

बहुत पड़ रही भीषण गर्मी पड़ती है अब नहीं फुहार!
तन मन दोनों व्याकुल हैं अब चलती भी है नहीं बयार!!
भीषण जाम सड़क पर देखो हुई प्रदूषण की भरमार
करते हैं संहार प्रकृति का फिर करते हैं हाहाकार!!

गर्मी से व्याकुल था मानव थी जल की दरकार!
बादल आँख मिचौली खेले नहीं बही जलधार!!
आस लगाए देख रहे सब आसमान की ओर
ईश कृपा से इतने में ही खूब पड़ी बौछार!!

नील गगन में तप्त सूर्य प्रचंड रूप में आया है!
ताप बहुत सूरज का है गर्मी ने बहुत सताया है!!
निर्जल हो गए ताल तलैया नदिया नाले सूख गए
तपन बहुत वसुधा पर है मौसम ने बहुत तपाया है!!

धूप ने फिर आज आँगन को अंगार कर दिया!
पेड़ की ठंडी छुअन को भी बेजार कर दिया!!
गर्मियों की शाम ने जब साँस ली थक हार कर
एक बादल ने गली भर को बौछार कर दिया!!

- ऍम. डी. यस. रामालक्ष्मी
१ जुलाई २०२६

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