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        गर्मी का आतंक

 

फैल रहा चारो तरफ गर्मी का आतंक
सूख गया जल ताल में शेष रहा बस पंक

घिर कर बादल आये तो किन्तु झरी नहीं बूँद
तपती धरती देख कर क्यों लीं आँखें मूँद

जुड़ कर रहते कब तलक स्वार्थ भरे सम्बंध
उमस भरे माहौल में टूट गये अनुबंध

विदा ले गई मधुर ऋतु बढ़ा ग्रीष्म का ताप
आग बरसती गगन से जल उड़ता बन भाप

सराबोर है स्वेद से तन हो गया निढाल
तेवर देखे सूर्य के और हवा की चाल

जेठ दोपहरी तप रही लब पर आहें सर्द
सहे जा रही बेबसी पग छालों का दर्द

- मधु प्रधान
१ जुलाई २०२६

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