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        जेठ दुपहरी

 

सूरज दहका सुबह से बन अगिया बैताल
जेठ दुपहरी घर छुपी बैठी है बेहाल

तेवर लख के सूर्य के छाया भी हलकान
घुसकर बैठे गेह सब रस्ते हैं वीरान

जीव-जन्तु सब सुबह से रहे पसीना पोंछ
सूर्य नदी में तैरकर ऐंठ रहा है मोंछ

कड़ी धूप बेचैन है खड़ी छांह ले ओट
भरी दोपहर गाल पर करे चोट पर चोट

सन्नाटे का शोर है जिसका ओर न छोर
आग बरसती आज-कल खूब रात-दिन भोर

भट्ठी जैसे दिन तपे आग बरसती रात
जीवन नदिया ताल के सूख गये हैं गात

ठहरा जल है ताप से अदहन के मानिंद
थलचर-जलचर जल रहे मुरझाए अरविंद

घात लगाए धूप है आग बह रही आज
पछुआ पीछे पड़ गई छोड़-छाड़ सब काज

ज्वार नौतपा को चढ़ा 'डिग्री'अड़तालीस
छांह छांह में बैठकर हांफे बाए खीस

- जयराम जय
१ जुलाई २०२६

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