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        सूखे का भूचाल

 

पाँवों में छाले पड़े उधड़ रही है खाल
हरियाली के गाँव में सूखे का भूचाल

नदी किनारे बैठकर देख सुलगती रेत
नाव लहर को कोसती बंजर गाते खेत

सड़क पिघलती धूप में पगडंडी के पाँव
पनघट प्यासे रह गए पेड़ न देते छाँव

पोंछ पसीना माथ से बैठा समय किसान
धूप लिए कागज कलम लिखती रोज मसान

लू लपटें अख़बार की ख़बर सनसनीख़ेज़
सूरज पढ़ता रोज़ ही तपते दस्तावेज़

नाव डुबा कर रेत में बैठी नदी उदास
तट सूनापन झेलता लिए कंठभर प्यास

नहीं निकलिए भूलकर लेकर नंगे पैर
छाँव तलक झुलसे यहाँ धूप पालती बैर

चुए पसीना माथ से गमछा ओढ़े बूँद
बैठी नीचे पेड़ के दुपहर आँखें मूँद

लू लपटों का ज़ोर है आँधी करे सवाल
दोपहरी की सड़क पर सन्नाटा वाचाल

ठंडे पानी के घड़े पनघट वाले गाँव
अमराई के बाग में शीतलता की छाँव

- जयप्रकाश श्रीवास्तव
१ जुलाई २०२६

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