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        सूरज का पारा चढ़ा

 

सूरज का पारा चढ़ा लू की तीखी चाल
धूप दहकती आग-सी लोग हुए बेहाल

खड़ी धूप भौंहे चढ़ा व्याकुल गाँव गिराँव
कोने में दुबकी पड़ी सकुचाई-सी छाँव

बैरन लगती दुपहरी बैरी लगे समीर
देख जेठ की हेकड़ी अवनी हुई अधीर

झुलसाती गरमी बदन धूप जलाती पाँव
थका मुसाफिर ढूँढता बरगद वाली छाँव

पंखा थक कर चूर है कूलर पड़ा निढाल
उमस भरे दिन रैन हैं जीना हुआ मुहाल

भीषण गरमी ने किया कर्फ्यू का ऐलान
बाहर पहरा घाम का सड़कें हैं सुनसान

तपा रही है नवतपा लेकर रूप प्रचंड
लू का चाबुक ले खड़ा गुस्से में मार्तंड

सूख गए जल स्रोत सब नदी ढूँढती धार
प्यासी धरती कर रही बादल की मनुहार

लुटा रहा है लालिमा लिए हृदय में शूल
ताप-बाण सह कर खिला गुलमोहर का फूल

- हिमकर श्याम
१ जुलाई २०२६

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