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        बेचैन किये दे रही  

 
बेचैन किये दे रही हालात की गर्मी
उस पर भी गज़ब तेरी ख़ुराफ़ात की गर्मी

दिन की हो, तो सह भी लें किसी छांह में जाकर
लेकिन सही जाती ही नहीं रात की गर्मी

लगता है तेरे रुख में, निगाहों में ठंडापन
अहसास की गर्मी है न जज़बात की गर्मी

आया न कोई फ़र्क सलीके में हमारे
कायम है वही, जो रही शुरुआत की गर्मी

ठंडी न हुई मेरे जवाबों से अभी तक
कैसी है भला तेरे सवालात की गर्मी

गो जिस्म सिहरता है जमे बर्फ़ की जद में
चुकने नहीं देती है ख़यालात की गर्मी

ये जेठ या आषाढ़ की गर्मी तो सही है
सहनी है अभी आपको बरसात की गर्मी

हम रस्म निभाने के लिए मिलते हैं यूं तो
अब याद नहीं पहली मुलाक़ात की गर्मी

माना कि नहीं हौसला उड़ने का रहा, पर
बाक़ी है मेरे पास तजुर्बात की गर्मी

- योगेन्द्र दत्त शर्मा
१ जुलाई २०२६

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