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        गर्मियों की वह दुपहरी

 

दोस्त सी आवाज़ देती, गर्मियों की वो दुपहरी
और रक़ीबों सी सताती, गर्मियों की वो दुपहरी

गुड़ छिपे आले में मटके में मलाई की दही है
राज़ नानी के जताती, गर्मियों की वो दुपहरी

धप की आवाज़ों पे चौंके कान ले कर दौड़ती फिर
फ्रॉक में अमिया छिपाती, गर्मियों की वो दुपहरी

शादियाँ गुड़िया की, गुट्टे और कड़क्को खेलने पर
त्यौरियाँ माँ की चढ़ाती, गर्मियों की वो दुपहरी

सर्दियों की रात भर माँगी थी हमने जो दुआएं
उनको तासीरें दिलाती, गर्मियों की वो दुपहरी

आह में थी लूह और मन में बवंडर धूल जैसे,
इश्क़ में दुगुनी तपी थी, गर्मियों की वो दुपहरी

शाम को मिलने का वादा, करवटों में जोहती थी,
रात से ज्यादा सताती, गर्मियों की वो दुपहरी

शोर करती हर तरफ फिरती तुम्हारी याद जानाँ
और सन्नाटे में डूबी गर्मियों की वो दोपहरी

- कंचन सिंह चौहान
१ जुलाई २०२६

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