अंजुमनउपहारकाव्य संगमगीतगौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहे पुराने अंक संकलनअभिव्यक्ति कुण्डलियाहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतर

        गर्मियों की ये दोपहरी

 

तेज़ तीखी तिलमिलाती गर्मियों की ये दोपहरी
बादलों से कब है हारी गर्मियों की ये दोपहरी

पेड़ पौधे घास गमले फिर से मुरझाने लगे हैं
क्या करे छाया बिचारी गर्मियों की ये दोपहरी

तुम न आए, आ गया सूरज सरों पे आँख मलता
साथ है किस्मत की मारी गर्मियों की ये दोपहरी

फिर कहाँ तुमको मिलेगा सर पे ये सूरज पिघलता
उफ़ खुदा की दस्तकारी गर्मियों की ये दोपहरी

फालसे तरबूज़ मीठे आम ले कर आ गयी है
आज पैसे कल उधारी गर्मियों की ये दोपहरी

तू नहीं आई अँधेरा छा गया सूनी गली में
तू जो रूठी मुझसे रूठी गर्मियों की ये दोपहरी

खींच के मारा किसी ने आसमाँ पे आज पत्थर
सुबह की डाली से टूटी गर्मियों की ये दोपहरी

- दिगंबर नसवा
१ जुलाई २०२६

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलन हाइकु हास्य व्यंग्य क्षणिकाएँ दिशांतर समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter