अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

        गरमी आई

 

गरमी आई गरमी आई
पेड़ों की छाया मन भायी
पंखे कूलर एसी मटके
लस्सी कुल्फी अरु ठंडाई

आसमान से आग बरसती
दोपहर में धरती है जलती
बनता सूर्य आग का गोला
गरम गरम है धूप निकलती

झुलस रही है क्यारी-क्यारी
बरस रही है ज्वाला भारी
बिन पानी ज्यों मछली तड़पे
तड़प रहे हैं सब नर नारी

नदी सरोवर ताल तलैया
कुआँ बावली सूखे भैया
प्यासे मरते हैं पक्षी सब
तोता मैना अरु गोरैया

- श्याम मोहन नामदेव 'श्याम' 
१ मई २०२१

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter