अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

        ताप के दिन

 

चढ़ रहा सूरज
कि आए ताप के दिन

ग्रीष्म के दिन बड़े है
रातें छोटी पर सुहानी
आँगना मे हो बिछौना जब
याद आ जाती है बरबस
दादी-नानी की कहानी
बीतते थे बिन बिताए पल-छिन
कि आए ताप वाले दिन

आग बरसाती हवाएँ चल रही हैं
चुप है अब सारी दिशाएँ
मौन से ही छल रहीं हैं
जाने कब आ पाएँ सागर से
बादलों के साथ मानसूनी घटाएँ
अब दोपहरी मे कहाँ वो खाट
और आम्रवन के छाँव वाले दिन
कि आए ताप वाले दिन

- कमलेश कुमार दीवान 
१ मई २०२१

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter