अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

कभी तो द्वार खुलेंगे
जनतंत्र की सोच को समर्पित कविताओं का संकलन
    कभी तो द्वार खुलेंगे !
कभी तो निकल बाहर आएगी
स्वाभिमान के साथ फूटती चिंगारी

कभी तो धवल होंगी
वो अनकही, दबी पड़ी तीव्र इच्छाएँ
कभी तो लहलहा उठेगा
सूरज की सतरंगी रोशनी सा
हमारा वजूद !

कभी तो उठेंगे ही
ये खौफ खाए हाथ
ये जंग लगी तलवारें
कभी तो ये पैर निडर हो
चल सकेंगे
अनल उगलती राहों पर

कभी तो होगा संग्राम
धधकेंगे जीत के शोले
और बदल जाएगा मंजर !
फिर बदलेगी फिज़ाएँ
महकेगी चहुँ ओर
पलाश के फूलों सी
स्वाधीनता की महक !

तब सृजन के तार
एक सुंदर सजीला जहाँ बुनेंगे
चलो बढ़ चलो
कभी तो द्वार खुलेंगे !

-हिमांशु कुकरेती
२४ जनवरी २०११

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter