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        चैत का गीत

 
वृन्तों पर अंगारों जैसे गुलमोहर के फूल
चैता ने दुलराया मौसम
लगा बहुत अनुकूल

अंबिया लटकी डाल-डाल पर गदराई ऐसे
कोई कुसुम -कली प्रियतम से शरमाई जैसे
अमलतास की पीली चूनर रही वृन्त पर झूल
सम्मोहन की बजी बाँसुरी
हँसे नदी के कूल

हमको लगी चमेली दिनभर खोई हुई उदास
रात-रात भर हरसिंगार की उड़ती रही सुवास
जब पुरवा ने तन सहलाया कोमल हुए बबूल
नागफनी पर विहँसा उपवन
लगे सुहाने शूल

टप- टप चुआ महकता महुआ आधी-आधी रात
खुसुर-पुसुर में हायरह गई तेरे मेरी बात
मन आवाराबेचारे से टूट न जाय उसूल
सन्नाटे बाँटे सपनों ने
नींद हुई प्रतिकूल

रात उनींदी दिन अलसाए औंघाये पल-छिन
घूँघट के भीतर गरमी से अकुलाई दुलहिन
देखा सुबह बिछौना उस पर बिछे हुए थे फूल
निर्मोही अवगुंठन को ही
गया उठाना भूल

नदी पियासी सूखे पोखर और हाँफते दिन
कब आएँगे कारे बदरा चेहरे हुए मलिन
उमस भरी बदनाम गली को चर्चा नहीं कबूल
सूरज की नाराजी देखो
पकड़ न जाए तूल

- प्रो.विश्वम्भर शुक्ल
१ अप्रैल २०२६

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