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        पर्वों का उपहार

 
चैत्र माह लेकर आया है
पर्वों का उपहार

प्रकृति का महका आँगन है
अति मनभावन नील गगन है
स्पष्ट दिख रहा दूर दूर तक
ठहरी ठहरी नजरें अपलक
खिले खिले सबके मुखमंडल
झंकृत मन के तार

नयी चाहते नये वर्ष की
प्रियकर बातें नये हर्ष की
प्रकृति दृश्य नये दिखलाती
अखियां फूली नहीं समाती
देवालय में खूब सजे हैं
नव फूलों के हार

गूंज हर जगह राम नाम की
भक्ति भाव में सुबह शाम की
लोकगीत में शब्द ढले हैं
सबको लगते बहुत भले हैं
भारत-भू के हर जनपद में
आई खूब बहार

आदि काल से परंपराएँ
अविरल गंगा खूब बहाएँ
मिट जाती हैं भेद भावना
केवल रहती स्नेह साधना
सबको मिल जाता है जब यह
नैसर्गिक उपहार

- सुरेन्द्रपाल वैद्य
१ अप्रैल २०२६

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