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नव संवत्सर वर्ष का |
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नव-संवत्सर वर्ष का, करने को
आह्वान।
चैत पहनकर आ गया, सुन्दर-सा परिधान।।
मन मधुवन सा लगे, अधरों पर मृदु हास।
लगा चैत के आँगना, उतरा है मधुमास।।
मन ही मन मुस्का रही, देख धरा का रूप।
अवगुंठन से झाँकती, चैत मास की धूप।।
अँखुआये हर डाल पर, चैत लुटाये प्यार।
जड़-चेतन में कर रहा, प्राणों का संचार।।
चटखारे ले चैत में, इत उत डोले मीत।
कली-कली के कान में, भ्रमर सुनाये गीत।।
खेतों से खलिहान तक, भरे अन्न-भंडार।
मिला चैत को चैत में, फसलों का उपहार।।
उत्सव का आनंद है, चैत-चाँद, नवरात।
आध्यात्मिक परिवेश में, राम-जनम सौगात।।
गाँव-गली में गूंजते, ढोल, मजीरे, थाप।
चैती गा-गा झूमते, लोग सभी, मैं, आप।।
कुछ तो है इस चैत में, मातृ शक्ति आशीष।
श्रद्धा के अधिभार से, झुक जाते हैं शीश।।
ध्यान, भक्ति, तप, योग का, जीव करे उपयोग।
मिट जायेंगे चैत में, तन-मन के सब रोग।।
- श्रीधर आचार्य 'शील'
१ अप्रैल २०२६ |
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