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        चैत्र मास आया

 
धूप ने ओस के आँचल में
नव-स्वप्न सजा डाले
मन के आँगन में
अंकुरित हुए फिर
हरियाले उजाले।

घड़ी-घड़ी बदलते क्षितिजों पर
समय ने नई रेखा खींची
थकी हुई साँसें भी जैसे
आशा ने चुपके से सींची।

मन के दुर्गम किलों पर
विजय पताका लहराई
नवपर्व की धार लिए
भक्ति सरिता मुस्काई।

मौन की वीणा छेड़ गई
अहिंसा की मधुर तरंग
त्याग-व्रत के कड़े पथों पर
चमका आत्मा का रंग।

मर्यादा के दीप जले जब
अयोध्या-सा हर घर जगता
धर्म-धरा पर चलने वाला
पथ भी सहज-सरल लगता।

राम-नाम की कोमल छाया
मन के वन को हरियाए
संयम के संकल्पों से
जीवन अपना रूप सजाए।

वज्र-काय में कोमलता का
अद्भुत मेल दिखाता
राम-काज में लीन हृदय
जीवन का पथ बतलाता।

चैत्र की यह पावन बेला
ऋतु-गीत नया दोहराती
संस्कारों की सुरभि लिए
धरती गगन को महकाती।

- संजय सुजय बासल
१ अप्रैल २०२६

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