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        आ गया है चैत्र

 
शजर उत्सव मनाए हैं के फिर से आ गया चैत्र
नौराते 'गौर' गाए हैं के फिर से आ गया चैत्र

पके हैं बेर बेरी पर, करीरों पर लदे हैं कैर
फले कीकर जताए हैं के फिर से आ गया चैत्र

वो गुड़हल मोगरा गेंदा भी मुस्काके कहें देखो
ये इसने गुल खिलाए हैं के फिर से आ गया चैत्र

पलाश अब जो दहकने हैं लगे बिरहा की अग्नी में
दिलों को ये बताए हैं के फिर से आ गया चैत्र

तुम्हीं लौटे नहीं हो 'रीत' आए नीम पर गुल हैं
वसंती शर सताए हैं के फिर से आ गया चैत्र

- परमजीत कौर 'रीत
१ अप्रैल २०२६

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