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        चैत्र का उल्लास

 
चैत्र शुक्ल की प्रतिपदा, खुशियाँ लाई अपार।
हिंदू नव संवत्सर का, महके आज सबके द्वार।।

बीत गया पतझड़ अब, छाई है नई बहार।
चैत्र मास ने कर दिया, कुदरत का श्रृंगार।।

अमवा की डाली पर, कोयल करे पुकार।
मिश्री जैसी घोलती, सुर की मीठी धार।।

नीम झरे कोपल नई, कड़वा लगे न कोय।
चैत्र मास में जो चखे, काया कंचन होय।।

शक्ति स्वरूपा माँ की, घर-घर ज्योत जलाय।
नवरात्रों की गूँज से, चहुँदिश मंगल हुआ जाय।।

नवमी पावन आ गई, प्रकट हुए राघव राय।
चैत्र मास का पर्व यह, मन को बहुत लुभाय।।

गेहूँ की बाली हँसे, गदगद हुए खलिहान।
चैत्र मास ने दे दिया, कृषक को वरदान।।

फागुन बीता झूमकर, चैत्र खड़ा मुस्काय।
धूप सुनहरी सुबह की, तन-मन को हर्षाय।।

मटकों का पानी लगे, अमृत जैसा आज।
चैत्र मास के आगमन, बदला सब अंदाज़।।

चैत्र मास देता हमें, जीवन का नव ज्ञान।
चैत्र मास की वंदना, गाता सकल जहान।।

- महेन्द्र तिवारी
१ अप्रैल २०२६

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