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        चैत से मिलना

 
चैत से मिलना हुआ तो
भोर के संग गाँव जाएँगे
मुस्कुराती लहलहाती
उस धरा को चूम आएँगे

कूँजती खेतों में होगी फसल पककर
सुर मिलाती कुहुकिनी टोहेगी रुककर
कौन मीठा गीत गाता आ रहा है
नवल ऋतु की डोलियों में आज चढ़कर

साथ उसका मिल गया तो
हम पथिक संग झूम गाएँगे

बाग में अमराइयाँ आने लगी हैं
जुगजुगी से ताल ठुकवाने लगी हैं
तितलियाँ नव सुर्ख़ पंखों में फुदकतीं
मधुकरों से छुपके इतराने लगी हैं

ऋतु बसंती कह गई है जाते-जाते
वर्ष अगले फिर यहाँ हम घूम जाएँगे

एक दीपक जल रहा है द्वार जगमग
क्यारियों में खिल रहा शृंगार रग-रग
चाक पर माटी चढ़ा कुम्हार हँसता
कलश रचकर साज दूँगा द्वार पग-पग

शाम ढलते लौटने की उस घड़ी में
नैन भरकर गाँव की रज भूमि लाएँगे

- जिज्ञासा सिंह
१ अप्रैल २०२६

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