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        चैत बैठा मेड़ पर

 

धूप की चादर बिछाए दिन
पढ़ रहा है छाँव का मन।

चैत बैठा मेंड़ पर
बस काटता है खेत
वहीं पर है ताकता
बगुला महाजन स्वेत
कर्ज का खाता उठाए दिन
भज रहा है गाँव का मन।

धार टूटी नदी के
खाली पड़े हैं घाट
चमचमाती रेत के
अब हो रहे हैं ठाट
प्यास लेकर कहाँ जाए दिन
रो रहा है नाव का मन।

दर्द की बैसाखियाँ
संभावना की राह
हो गई है अपाहिज
मंज़िलों की चाह
टूटते रिश्ते निभाए दिन
खोजता है ठाँव का मन।
1
- जयप्रकाश श्रीवास्तव
१ अप्रैल २०२६

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