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चैत का आना |
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चैत का आना वैसा नहीं अब
नौरात्रों की हल्की सिहरन भरी सुबहों में
कालियावाले दुर्गा मंदिर जाना
“अम्बे तू है जगदम्बे काली”
आरती में डूब जाना
छूट गया बरसों पहले,
अब वो समय नहीं।
साते का मेला लगा करता था
मंदिर के कच्चे रास्ते पर
उत्साह और कौतूहल
की वह राह
अब कोई पकड़ता नहीं,
रंग, गुड़, खिलौनों की वह गूँज शहर तक
कभी पहुँची नहीं।
हाथों में थाली, दीये की काँपती लौ,
भीड़ में पहचान का वह अपनापन
सब पीछे छूट गया
कोयल की तान सुबह की हड़बड़ाहट में बिखर जाती है।
बौर की गंध दफ्तर की नीरस फाइलों में ठहर जाती है
आँगन की हँसी कमरों में गुमसुम रहती है
मिट्टी की सौंधी स्मृति
कंक्रीट तले ऐंठी है।
फिर भी
मन के सूखे कोने में एक कोंपल अड़ी रहती है
समय की दरारों में धीरे-धीरे हरी रहती है।
चैत आता है तो, कहता है-
इस शोर में भी सुनो,
थोड़ा सा आकाश बचाकर
अपने भीतर एक मौसम चुनो।
उस आवाज़ में उम्मीद है
शायद कभी कदम मुड़ जाएँ
और हम फिरकिसी मंदिर की सीढ़ियों पर
चैत को पा जाएँ।
- भावना सक्सेना
१ अप्रैल २०२६ |
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