चाय का ठाँव

 
वो माटी का कुल्हड़
वो चाय का ठाँव
बहुत याद आने लगा है
वो गाँव

वो झोपड़ की टूटी सी
बूढ़ी दुकाने
कहीं रेडियो पर
पुराने से गानें

बूढ़े से बरगद की
ठंढी सी छाँव

कड़क चाय चुस्की हो
दुनिया की बातें
वही राजनीति
बहुत से खुलासे

वो संसद भवन जैसे
बहसों के दाँव

वो माटी का कुल्हड़
वो चाय का ठाँव

- उमेश मौर्य
१ जुलाई २०२०

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