कुल्हड़ वाली चाय

 

 
लड़ी करोना से हफ़्तों तक
नुक्कड़ वाली चाय
आज मिली तो महक उठी फिर
कुल्हड़ वाली चाय

तन की भूख करे कम
लेकिन मन की भूख बढ़ाये
गेहूँ जैसा रंग मगर
तुलसी की खुशबू आये

इसे समझ मत लेना
लालबुझक्कड़ वाली चाय

आहिस्ता-आहिस्ता पीना
मीठी है शक्कर सी
जबरन पी तो मुँह में छाले
पड़ जाएँगे भाई

राजा जी की चाय नहीं
ये फक्कड़ वाली चाय

बना रहे ये नुक्कड़ यूँ ही
बनी रहे ये गुमटी
बेच न पाये इसे किसी को
लालच बनिया कपटी

थक जायें जब पिया करें
सब बड़बड़ वाली चाय

- ‘सज्जन’ धर्मेन्द्र
१ जुलाई २०२०

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter