हुई बारिश           

 
हुई बारिश ज़मीं महकी हुई है
सो ख़ुशबू दिल में अब उट्ठी हुई है

उफ़नती नाचती ललचा रही वो
जो प्याली चाय की छलकी हुई है

वो आए हैं हमारे घर पे मिलने
तो चर्चा चाय पर चलती हुई है

पकौड़े साथ हों तो ख़्वाब पूरा
कि जैसे हीर-राँझे की हुई है

नशे की तरह सर्दी के दिनों में
ज़बाँ पर सबके ये चढ़ती हुई है

वो इक प्याली से उठती भाप देखो
कोई तस्वीर सी बनती हुई है

वो चुस्की चाय की और ख़्वाब में तू
ग़ज़ल जैसे कि इक बनती हुई है

- सुवर्णा दीक्षित
१ जुलाई २०२०

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter