अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

 

गरमागरम बेचते भुट्टे






 

शहर मसूरी या फिर शिमला
जाओ या कश्मीर
गरमागरम बेचते भुट्टे
एक दिखी तस्वीर!

सबके सब किस्मत के मारे
घर से बेघर सब बन्जारे
एक खुशी बस हाथ बटाती
हर राँझे की हीर!

सिर पर रहती सदा उधारी
सपनों में भी मारामारी
साथ धुँए के चुए पसीना
पिघले मन की पीर!

दिन पूरे का पूरा खपता
जेब ताकता रहता हफ्ता
वर्दी जब चाहे सहलाए
बंदे की तकदीर!

बदल गया है मंजर सारा
पूरा जग विपदा का मारा
बेसुध सिगड़ी गुमसुम ठेली
कौन बँधाए धीर!!

- डा आर पी सारस्वत
१ सितंबर २०२०

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter