अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

 

घर में भुनते भुट्टे थे






 

रिमझिम बूँदें घिरी घटाएँ
घर में भुनते भुट्टे थे

आओ मुनिया, ताई, चाची
अम्मा ने सबको टेरा है
लेकिन दुद्धी-भुट्टा है जो
छूना मत, वो तो मेरा है

हँसी ठठाकर माँ की सखियाँ
हमने खेले गुट्टे थे

केले के पत्तों के दोने
उनमें भरा चबेना चटपट
गुड़ियों का फिर ब्याह रचाया
खाएँ बराती नटखट नटखट

कम ज़्यादा दानों के ऊपर
लड़ते-भिड़ते गुड्डे थे

उबलें, गेंहूँ लाल चने जब
बाबा को अच्छा लगता था
भरे खेत टर्राते मेढक
जल-जीवन सच्चा लगता था

गाँव सिमट ओसारे में छिप
प्रेमिल मारे सुट्टे थे

- कल्पना मनोरमा
१ सितंबर २०२०

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter