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         बादलों का खेल

 
 
घिर रहे चारों दिशाओं में सघन
बादलों का खेल नभ
पर देखिए

हर तरफ श्यामल घटाएँ घिर रही
साथ लेकर नम हवाएँ फिर रही
रंग नभ के खूब गहरे हो रहे
आसमानी रंग अपना खो रहे
भीगने को खूब करता आज मन
बादलों का खेल नभ
पर देखिए

छोर सारे खूब भीगे जा रहे
पेड़ पौधों को बहुत सरसा रहे
तृप्त होती जा रही पावन धरा
आसमां है गंध सौंधी से भरा
एक सिहरन से निखर जाता बदन
बादलों का खेल नभ
पर देखिए

जब घटाओं का समय आता निकट
धूप के साये सभी जाते सिमट
बिजलियां भी कौंधती सहसा कभी
गर्जना करते जलज बरबस तभी
शोर करता खूब झर उठता गगन
बादलों का खेल नभ
पर देखिए

- सुरेन्द्रपाल वैद्य
१ अगस्त २०२४

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