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         सावन की अगवानी

 
 
ढोल बजाकर मेघ कर रहे
सावन की अगवानी

झर झर झरती बूँदें भू पर
रुनझुन रुनझुन नाचें
पवन झकोरे
दिशा दिशा में
नेग गंध के बाँटें
राग किसी ने बिरहा छेड़ा
जागी पीर पुरानी

मृदुल लताएँ पेड़ों से
गलबहियाँ करने भागें
सूखे ठूँठों के भीतर भी
सरस कोंपले झाँकें
इठला कर चलती हैं नदियाँ
सब पर चढ़ी जवानी

होरी की चिंता
कैसे ये बीतेंगे चौमासे
भीगी कथरी टूटा छप्पर
कब तक होंगे फाँके
सब कुछ बदला किंतु न बदली
उसकी रामकहानी

- शिवजी श्रीवास्तव
१ अगस्त २०२४

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