अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर


       मेघराज इठला रहे

 
 
मेघराज इठला रहे अंबर तल पर आज
बूँदों के सर सज रहा रंग बिरंगा ताज

आतुर हैं बूँदे सभी उतर धरा पर जाँय
सहमी हैं बूँदें सभी सूरज से घबराँय

काली बदरी छा रही मन में आस जगाय
बड़ी निगोड़ी पवन है, उड़ा उड़ा ले जाय

मेघराज डरने लगे धरती पर क्यों जाँय
तपा बहुत डाली धरा हम ही झुलस न जाँय

काले मेघा छा गए धरा रही हर्षाय
मनमौजी मेघा सभी तरसा-तरसा जाँय

पहले धरा सँवार तू फिर करना मनुहार
हम निडर हो आएँगे बरसाएँ जलधार

- निर्मला जोशी 'निर्मल'
१ अगस्त २०२४

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter