अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर


       सुनते नहीं बादल

 
 
अनुनय विनय किसी की भी सुनते नहीं बादल
ऊम्मीद जिनसे थी वही बरसे नहीं बादल

पानी बगैर चारो तरफ लोग परेशान
आखिर क्यों सबका दर्द समझते नहीं बादल

वादे किये अगर तो निभाओ भी बरस कर
वादे तमाम करके मुकरते नहीं बादल

दादुर पपीहा मोर बुलाते हैं तुम्हें सब
क्या बात है जो घर से ही निकले नहीं बादल

सूखा कभी तो बाढ़ से देते हो तबाही
हम लोग आज तक तुम्हें समझे नहीं बादल

- राम अवध विश्वकर्मा
१ अगस्त २०२४

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter