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       दिलदार बादल

 
 
उफ़क पर छा गये दिलदार बादल
ले आये सावनी त्योहार बादल

सुनी जो आह धरती की मुसलसल
बरसने को हुए तैयार बादल

नरम फाहे से दिखते नभ में अनगिन
सजल मोती के होते हार बादल

गरज से अपनी जो दहला रहे दिल
छुपाये हैं असीमित प्यार बादल

झुका अम्बर धरा पर तो बरस कर
ख़ुशी का कर रहे इज़हार बादल

कभी चैती कभी कजरी की धुन में
ढली बूँदों की है झंकार बादल

भरे हों चाहे जितने पानी से पर
नहीं बरसे तो हैं बेकार बादल

कभी बरसे कभी सूखे ही गुज़रे
नहीं रहते कभी यकसार बादल

- आभा खरे
१ अगस्त २०२४

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