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         गर्मी सता रही है

 
आसमान से आग बरसती
आँच धरा को जला रही है
आकुल-व्याकुल जड़ चेतन सब
गर्मी सबको सता रही है

बिजली पानी के संकट से
महानगर तक जूझ रहे हैं
जननायक महलों में बैठे
नई पहेली बूझ रहे हैं
उनके तरण ताल के अंदर
एक जलपरी नहा रही है

जेठमास में सूरज दादा
दादागीरी दिखा रहे हैं
जो भी दिखे सामने उसपर
लू के हंटर चला रहे हैं
दादी जी लू से बचने के
सौ-सौ नुस्खे बता रही हैं

नहीं मिलेगी चाय किसी को
भाभी शरबत बना रही हैं
दोपहरी में अम्मा सबको
पना आम का पिला रही है
प्यासी गौरैया आँगन में
फुदक-फुदक फड़फडा रही है

बजा-बजा घंटी गलियों में
अनवर कुल्फी बेच रहा है
माथे पर बह रहा पसीना
बार-बार वह पोंछ रहा है
लेकर इक कुल्फी मजदूरिन
दो बच्चो को चटा रही है

- डॉ. शिवजी श्रीवास्तव
१ जून २०२४

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