अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

         शरबत जैसे दिन

 
आएँगे कब भरे जेठ में
राहत जैसे दिन
तपती लू में प्यास बुझाने
शरबत जैसे दिन

दूर-दूर तक छाँव नहीं है
तपती सड़कों पर
इमारतों ने छीन लिए हैं
टेसू, गुलमोहर

बीत रहे हैं कड़ी धूप में
आफ़त जैसे दिन

सूखे कंठों की सुनने को
नल तैयार नहीं
नदियों के हिस्से में
उनकी कलकल धार नहीं

बीत रहे हैं 'मेघ! मेघ!' कर
मिन्नत जैसे दिन

तपती सुबह जी रही है
दुपहर की ख़ामोशी
तपे तवे पर साँझ दिखाए
कहाँ गर्मजोशी

फिर भी पगड़ी बाँध खड़े हैं
किल्लत जैसे दिन

- गरिमा सक्सेना
१ जून २०२४

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter