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           चार क्षणिकाएँ

 
१
तपती धूप में
बरगद की छाँव सी
शहर की थकी भीड़ में
सुकूँ भरे गाँव सी
शरबत सी मीठी
तुम्हारी याद है
दर्द के दरिया को
पार कराती नाव सी

२
उसकी
मासूम सी
खिलखिलाहट पर
निछावर हैं
शर्बत के कई गिलास
तीन क्षणिकाएँ

३
बहुत
उगल चुके आग
क्या मिला ?
अब जरा मन में /थोड़ी सी
शर्बत सी मिठास
घोल कर देखो

४
काश
जीवन की यह
आपा-धापी
तनाव,उलझनें
न होतीं हमारे साथ
होते बस तरो-ताजा
करने वाले मीठे-मीठे पल
रूह आफ़ज़ा शर्बत की तरह

- मधु प्रधान  
१ जून २०२४

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