अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

         शीतल पेय दुकान (दोहे)

 

बाज़ारों में सज गयी, शीतल पेय दुकान
दही, लस्सी, छाछ संग, तन की मिटे थकान

तोड़ बर्फ़ गोले बने, मीठा सा रस पान
काला, खट्टा, संतरी, शर्बत का परिधान

हाट लगे बाज़ार में, फल ककड़ी मुस्काय
नींबू, कैरी का पना, गन्ना प्यास बुझाय

जौ के सत्तू घोलकर, मिश्री, दूध मिलाय
मटके का पानी, गला, तन शीतल कर जाय

खट्टी मीठी ज़िंदगी, शर्बत जैसे बोल
रिश्तों की कलियाँ खिले, फाग प्यार के घोल

गरमी सा तपने लगे, जब मन का संताप
रंग बिरंगी याद की, बर्फ़ घोलिए आप

प्रियवर शर्बत से लगे, खट्टे लगते तंज
माँ की शीतल छाँव में, सुख माटी स्पंज

ठंडी ठंडी ज़िंदगी, चुभे शुष्क व्यवहार
मीठा सा जलपान है, मित्रों का दरबार

खट्टी जब बातें लगे, कड़वे पत्राचार
मौन बर्फ़ को घोलकर, डाले प्रेम अचार

- शशि पुरवार
१ जून २०२४

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter