अंजुमनउपहारकाव्य संगमगीतगौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहे पुराने अंक संकलनअभिव्यक्ति कुण्डलियाहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतर

   जलजीरा- जीवन का भूगोल व्याकरण

 
जलजीरा रस-रचना है जीवन की सच्चाई है
घूँट भरा जिसने भी इसका जान गया गहराई है
इमली जैसे कसक अधूरी मन के कोने पलती है
बीते कल की धूप-छाँह में चुपके-चुपके जलती है

हरा पुदीना आशा ताज़ी साँसों को हरिया जाए
थके हुए इस राही मन को छूकर फिर से हर्षाए
काला नमक एक चुटकी सच का स्वाद जगाए है
झूठे भरमों से आगे बढ़ मन अपनी राह बनाए है

भुना जीरा अनुभव की गाथा आँच में तप-तप निखरा है
समय की धार में बहकर ज्यों हर दिन मन ये निखरा है
मीठा उतना जितना हँसना बिना वजह भी आ जाए
वरना चीनी भी ज़्यादा हो तो स्वाद सभी बिगड़ा जाए

तीखा थोड़ा चेत जगाने नींद पुरानी तोड़े
जड़ता की जमती परतों को एक झटके में तोड़े
जीवन का भूगोल-व्याकरण जलजीरा रस-रचना है
घूँट-घूँट में संतुलन का ये शांत अनकहा दर्शन है

- भावना सक्सैना
१ मई २०२६

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलन हाइकु हास्य व्यंग्य क्षणिकाएँ दिशांतर समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter