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         जलजीरा

 
बारूदी तोप लिए सूरज, जब दिनभर आग उगलता है
थकी-थकी सी श्वासें लेकर, प्यासा मनुज झुलसता है
जलजीरा जनमानस का तब
संबल बना चहकता है

स्वेद ग्रन्थियां उत्साहित हो, लवण निकालें जब तन से
मुरझाई सी काया भी फिर, हार कहाँ माने मन से
गैस-अपच की धक्कमधुक्का, उदर-गली ने झेली जब
खट्टे-मीठे जलजीरे ने, उनसे की अठखेली तब
पाचक पेय मिला मानव को
गुण सुन हृदय हुलसता है

हींग पुदीना जीरा इमली, सब औषधि गुण का हिस्सा
स्वाद ताजगी लिए शरण में, लिखते जलजीरा किस्सा
बचपन वाली लाल मटकियों में, ठेले के वादों ने
भरी तरावट जीवन में फिर, खट्टी-मीठी यादों ने
जलजीरा पहचान बनाए,
अनुभव लिए छलकता है

- अनिता सुधीर आख्या
१ मई २०२६

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